Shrutiarohan.

राहु की रौशनी बनाम सूर्य की रौशनी

बात १९९३ की है मैं PGDCA कर रही थी। कम्प्यूटर्स में मास्टर डिग्री उस समय गर्व की बात होती थी। पड़ौस में एक नया परिवार रहने आया रेनु डांडिया आंटी, हमारे स्कूल डेज में मैथ्स की बुक्स कोर्स मे थी डांडिया सर के नाम से वो उनकी बेटी थी। पिता की तरह टेलेंटेड थी वो भी, उनके भी एक बेटी थी तीन साल के करीब और दूसरा बेबी होने वाला था। रात दिन वो टी. वी. पे मूवी देखती। मेरी माँ बहुत समझाती कि तुम्हारे होने वाले बेबी को हानि हो सकती है, अभिमन्यू ने माँ के गर्भ मे ही चक्रव्यहू की रचना सीखी थी, तोड़ने की इसलिये नही सीख पाया कि सुभद्रा सो गई थी। अत: ऐसे समय में जो तुम करोगी बच्चे पे उसका पूरा असर होगा। माँ की हिदायत उन्होने नही सुनी। पुत्र हुआ, बहुत कमज़ोर था और आँखे भी बहुत कमज़ोर थी।तीन वर्ष की आयु तक तो उसके चश्मा लग गया और वो रात दिन मूवी देखता क्योकि गर्भ में ही उसे अत्यधिक टी.वी. देखने की बुरी आदत लग गई थी। अब आंटी माँ से रोज़ पूछती कि क्या करे कैसे सुधारे इसको?? 
मैं जो कम्प्यूटर लैब मे आठ-आठ घण्टे बिताती थी। यह देख मैं घबरा गई कि मैं कही खुद को हानि तो नही पहुंचा रही। मैंनें संतुलन बनाना शुरु किया लेकिन वहीं से मेरा शोध शुरु हुआ राहु पे। 
माँ ने कहा बच्चे को रोज़ मैदान मे खिलाने ले जाया करो और सूर्योदय हो तो जल अर्पित करवाओ।घर में सूर्य की रौशनी रखो दिन मे भी परदे लगा के अँधेरा रखती हो और टी. वी. की रौशनी बच्चे की आँखो पे बुरा असर कर रही है। 
आज विचार करती हूँ तो देखती हूँ आज रात भी रौशन है।इतनी चकाचौंध रौशनी की तारे नज़र नही आते। आँखो की रौशनी बढ़ाने के लिये माँ त्राटक सिखाती थी। उसमे बिंदू त्राटक, दीपक त्राटक के अलावा, तारा त्राटक भी होता था। अब तो तारे नही और वो त्राटक नही। 
और एक रौशनी है राहु के बल्ब की जिसे एकटक देखने से आँखो की रौशनी जा सकती है। फिल्म की शूटिंग मे तेज राहु की रौशनी का सामना करते हुए कलाकार अपनी आँखे खराब कर लेते है और कैंसर जैसे रोग तक से ग्रस्त होते है।कुछ वर्ष पूर्व कजिन जो भूगर्भ वैज्ञानिक है केंसस सिटी में, उसने बुआ को फोन करके बताया कि उसे हमेशा बंकर में बने लैब में रहने के कारण गंभीर कैल्शियम की डेफिंश्येन्सी हो गई है और साथ ही विटामिन डी की, वो लैब में राहु की तेज़ रौशनी के सम्पर्क मे थी, लेकिन डॉक्टर के इंजेक्शन्स भी उसकी डेफिशियेन्सी कंट्रोल नही कर पाए। क्योकि वर्षो से वो दूर थी सूर्य की रौशनी से। वो वीकेन्ड पे अब घण्टो सन बाथ लिया करती। वो ठीक होने लगी थी। 
फ़िर याद आया वो दिन जब भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भारत के नागरिको से आह्वान कर रहे थे कि सब घर के बल्ब बंद करके दीपक जलाना। लोगो ने उपहास बनाया वो नही जानते थे कि राहु जनित रौशनी नौ मिनट के लिये बंद करके और सूर्य के कारक की रौशनी दीपक से क्या लाभ होगा। 
सूर्यग्रहण भी तो नही देख पाते हम नंगी आँखो से जब राहु ग्रसित कर रहा होता है सूर्य को। हमेशा के लिये हमारी आँखो का रेटिना खराब कर देता है। और यही सूर्य हमारे नेत्र विकार दूर करता है सूर्योदय के समय जब राहु के ग्रहण से दूर होता है। 
सार यह निकला कि जीवन में सूर्य की रौशनी जीवन है और राहु का अँधकार भी और रौशनी भी जीवन का अंत है। 
किंतु प्रश्न यह आता है कि क्या हम बिजली, टी.वी., मोबाइल, इंटरनेट के बिना रह भी तो नही सकते तो क्या करे कि राहु की रौशनी हमे हानि ना पहुँचाए।
बहुत सरल है जिस तरह काँटे को निकालने के लिये काँटे का प्रयोग किया जाता है राहु का प्रयोग उतना ही करे। जितना हो सके वो लोग जो इंटरनेट से जुड़े कार्यो मे व्यस्त रहते है वो अपने प्रकृति से सम्पर्क बनाए रखे। 
नित्य सूर्य को जल अर्पित करे। सूर्य स्नान ले। आँखो के व्यायाम करे। त्राटक करे,प्राणायाम और अन्य योगासन अपने योग गुरु के निर्देशन मे करे। गर्भिणी स्त्रियाँ गर्भकाल में धार्मिक पुस्तके पढ़े, प्रयास करे कि टी.वी. मोबाइल से दूरी बना ले। मैने पाया है कि आजकल के बच्चो की कुंडलियो में राहु जनित दोष अधिक होने के पीछे का कारण माँ का रात दिन इलेक्ट्रोनिक गजेट्स से अधिक सम्पर्क रहा है। और फ़िर रही सही पूरी कसर हम उनके जनम के बाद नन्हे हाथो मे मोबाइल थमा के करने लगे है। 
अति हर चीज़ की हानि करती है अत: संयमित, सात्विक और संतुलित आहार-विहार, खान-पान रखे ताकि स्वस्थ जीवन को जी कर सुखी रह सके।

-श्रुति आरोहन (सुरजीत तरुणा)

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