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शनिदेव की साढ़ेसाती और उनकी न्याय व्यवस्था 

शनिदेव क्या सच में दंडाधिकारी है? क्या वो आपको सजा देने आते है आपके जीवन के उम्र के तीन या चार पड़ाव में??  बिलकुल दंडाधिकारी है लेकिन आपके बुरे कर्मों के। न्यायाधिकारी है आपके अच्छे कर्मों के। आपको राजा से रंक बना देते है और रंक से राजा। 
साढ़ेसाती के तीन चरण तो सब जानते है 
लेकिन सबको यह संशय रहता है कि क्या जीवन में तीन बार या चार बार आएगी साढ़ेसाती तो क्या दंड ही देंगें। 
आज हम बात करते है यहाँ जीवन में आने वालीतीन साढ़ेसाती के प्रभाव की। 
१. जीवन के पहले पड़ाव में जब साढ़ेसाती आती है तो आप कच्ची उम्र मे होते है। यही वो समय है जब आप ग़लत संगति में पड़ सकते है या स्वयं को तपा कर कुंदन बना सकते है। यह वो समय है जब माता पिता को बच्चे पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है। क्योकि इस समय की साढ़ेसाती में जो बालक बिगड़ा उसका पूरा जीवन सुधरना जटिल कार्य है। 
२. साढ़ेसाती का जब दूसरा दौर युवावस्था में आता है या गृहस्थ जीवन में तो शनिदेव दंड देते है यदि आपके कर्म बुरे थे। वो आपकी आर्थिक दशा खराब कर देते है या आपके व्यवसाय में रूकावटें लाते है। आपके गृहस्थ जीवन में कलह उत्पन्न कर देते है। यदि आप सही राह पर होते है तो इस दशा में वो आपकी आर्थिक उन्नति करते है। आप सभी सुख वैभव प्राप्त करते है। यही नही आपका इच्छित जगह स्थानांतरण होता है यदि आप नौकरी मे है। आप नौकरी की तलाश मे है तो आपको नौकरी मिलती है। 
३. उम्र के इस पड़ाव में जब आप लगभग वानप्रस्थ आश्रम मे प्रवेश कर चुके होते है या करने वाले होते है और आप वासना में लिप्त हो जाते है या अपने खानपान में आप सात्विक नही रहते है तो आपको अस्थाई और असाध्य रोग दे देते है जिससे आपका बुढ़ापा दुखदाई हो जाता है। यदि आप सात्विक रहते है आध्यात्मिक जीवन जीते है सात्विक आचरण और आहार विहार करते है तो आप जीवन के इस पड़ाव पर भी हृष्ट-पुष्ट रहते है। 
०शनिदेव की साढ़ेसाती आने से पूर्व आपके बुध पर असर डालती है, राहु केतु एक्टिव हो जाते है उसके साथ शुक्र भी शनिदेव का साथ देने लगते है। अतः शनिदेव की साढ़ेसाती का मूल मंत्र आपके कर्मों पर निर्भर है। 
जीवन का अंतिम पड़ाव यदि आपने आध्यात्मिक जीवन को बिताते हुए और स्वस्थ बिताई है। तो समझ ले कि शनिदेव आप पर पूर्णतः प्रसन्न है। आपका सुखद अंत बताता है कि आपने जीवन में शुभ कर्म किये थे या जीवन के अंतिम पड़ाव आने से पूर्व स्वयं में सुधार कर लिया था। 
साढ़ेसाती के यह तीन पड़ाव आपको बार बार चेतावनी देती है कि समय है कर्म सुधार लो, समय है कर्म सुधार लो। जिस जातक ने स्वयं को सुधार लिया वो शनिदेव की कृपा पा लेता है। उसके जीवन में सूली का काँटा बन जाता है। यदि शनिदेव आपके जीवन के दो पड़ाव में आपको बहुत पीड़ा दे रहे है फ़िर भी आप विचलित नही हुए और उस कठिन दौर को धैर्यपूर्वक बिताकर कर्म प्रधान बनकर धर्म की राह पर चलते रहे तो निश्चित आपका अंतिम पड़ाव सुखद होगा। 

-श्रुति आरोहन(सुरजीत तरुणा)

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