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षष्ठम् भाव शत्रु व रोग या प्रतिस्पर्धा व नौकरी

शीर्षक में वर्णित कारकत्वों के इतर षष्ठम् भाव और भी कारकत्वों को इंगित करता है। किंतु हम उपरोक्त इन मुख्य कारकत्वों पर ही आज चर्चा करेंगें। 

सर्वप्रथम हम समझतें है कि यहाँ शत्रु कौन है?? संकुचित दृष्टिकोण वाली विचारधारा में जो सबसे पहले विचार आता है शत्रु का तो वह विचार आता है “कि फलाँ व्यक्ति या मनुष्य मेरे प्रति शत्रुवत है। या फलाँ व्यक्ति ही शायद बॉस के दिल में मेरे प्रति कान भर रहा है।”

यह जो संकुचित मानसिकता या दृष्टिकोण है वही आपका शत्रु है, ऋषियों नें जिन शत्रुओं पर यहाँ विचार करने को कहा है वह षट-रिपु यानि छः शत्रु कौनसे है? क्या हमनें कभी उन पर विचार किया? 

वह छः शत्रु है हमारे भीतर के छः मनोविकार- 

काम, क्रोध, भय, मोह, लोभ और अहंकार या (किसी किसी के मत से) मत्सर (द्वेष/ईर्ष्या) 

वास्तविक शत्रु यही तो है मनुष्य के। अब जो आपके भीतर आपके मनो-मस्तिष्क में विचार आया कि फलाँ व्यक्ति शत्रु है, या उसने मेरे विरूद्ध कुछ किया है या उसके पास तो बड़ा मकान है मेरे पास नही” यह विकार है और 

यह षट-रिपु यह विकार जब बढ़ जाते है तो आप रोगों से घिरने लगते है। मानसिक विकार अब आपमें शारीरिक विकार देने लगता है। डॉक्टर या वैद्य के पास जाते है तो वैद्य जी कहते है कि आप बहुत चिंता करते है आप बहुत क्रोध करते है इसलिये आपको डायबिटीज़ यानि मधुमेह हो गया, आपका रक्तचाप यानि आपका ब्लड प्रेशर इसलिये बढ़ गया। आपको हृदय रोग इसलिये हो गया। समस्त रोगों की जड़ अब यही है। 

यह तो था षष्ठम् भाव का नकारात्मक पक्ष यह नकारात्मकता आपने स्वयं जनम दी या आप प्रारब्ध से लेकर आए। यदि आपने स्वयं जनम दी है तो उसे दूर करना बहुत ही सरल है। प्रारब्ध से लाएं है तो थोड़े प्रयास से दूर किया जा सकता है। 

अब बात करते है हम इसके सकारात्मक पक्ष कि 

इसे ऐसे समझें-

आपके भीतर विचार आता है कि “फलाँ पड़ौसी ने नई कार ली। मैं भी परिश्रम से लेकर आऊँगा या आऊँगी। 

यहाँ आपके भीतर जो विचार आया वह विकार उत्पन्न नही कर रहा है क्योकि आप ईर्ष्या नही कर रहे है आप प्रतिस्पर्धा कर रहे है।

अब आप कार खरीदना चाहते है तो आपके भीतर परिश्रम करके कार खरीदने का विचार आता है जिसके लिये आप या तो व्यवसाय करने के लिये प्रयत्न करेंगें या नौकरी करने के लिये। क्योकि आप जानते है कार के लिये धन की आवश्यकता होगी। यह प्रयास आपका सकारात्मक है। 

किंतु आपके भीतर विचार आता है कि आपको कार ससुराल से मिल जाए, या आप चोरी करके प्राप्त करें या आपके घर के बड़े आपको दिलवा दें तो यह विचार प्रतिस्पर्धा का नकारात्मक है। यानि आपने कार खरीदना तो है किंतु अपने परिश्रम से नही। और यह विचार आपके विकास में बाधक होने के साथ ही आपको ग़लत दिशा की ओर अग्रसर करने लगता है। आप अपराध से सुख चाहेंगें तो आप कोर्ट कचहरी में फँस सकते है। अतः यही वह भाव है जहाँ आप कोर्ट कचहरी का भी विचार करते हैं।

निष्कर्ष पर आएं तो क्या सच में ही षष्ठम् भाव शत्रु व रोगों का है ? ज़रा विचार करें कि कारण क्या बने अग़र ऐसा है तो? यदि यह प्रतिस्पर्धा का है नौकरी व व्यवसाय का है तो उसके पीछे क्या कारण बनें? 

ऐसे कौनसे ग्रह से इस भाव का संबंध बना या यह भाव पीड़ित कैसे हुआ जिसके कारण आप नकारात्मक पक्ष में चले गए और कौनसे ऐसे ग्रह या भावों से षष्ठम् भाव का संबंध बना जिसके कारण आप नौकरी मे या व्यवसाय में है। यह आपको समस्त कुंडली विश्लेषण के आधार पर बताया जा सकता है। 

आप जान सकते है और उचित मार्गदर्शन से अपने जीवन के सकारात्मक बना सकते है। 

-श्रुति आरोहन-तरुणा

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जय श्री कृष्णा 😊🙏🏻🙏🏻

Pic Courtesy Google

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